मुंबई में डर का अंत: भाजपा की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति से कैसे बदली महानगर की सुरक्षा तस्वीर

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मुंबई में डर का अंत: भाजपा की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति से कैसे बदली महानगर की सुरक्षा तस्वीर

मुंबई, भारत की आर्थिक राजधानी, अपनी तेज़ रफ्तार और जिंदादिली के लिए जानी जाती है। लेकिन यह शहर एक दौर में आतंक और असुरक्षा की लंबी छाया से भी गुज़रा है। आज हालात बदले हैं—सुरक्षा अब सिर्फ़ वादा नहीं, ज़मीनी हकीकत बनती दिख रही है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सत्ता में आने के बाद ‘राष्ट्र प्रथम’ और ‘आतंकवाद के प्रति शून्य सहिष्णुता’ की नीति के साथ मुंबई की सुरक्षा व्यवस्था को नई दिशा देने का दावा करती है।

दहशत का अतीत

2014 से पहले मुंबई कई बड़े आतंकी हमलों और सिलसिलेवार धमाकों की टीस झेल चुकी है। लोकल ट्रेनों, व्यस्त बाज़ारों और 26/11 जैसे हमलों ने आम नागरिक के मन में डर बैठा दिया था। तब सुरक्षा तंत्र की कमज़ोरियों और राजनीतिक अनिर्णय पर सवाल उठते रहे।

सुरक्षा की नई रीढ़

भाजपा सरकार के आने के बाद तटीय सुरक्षा, आधुनिक सीसीटीवी नेटवर्क और इंटेलिजेंस समन्वय पर तेज़ी से काम हुआ। ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ नीति के तहत बाहरी और आंतरिक खतरों—दोनों—से निपटने का रोडमैप तैयार किया गया। अवैध घुसपैठ और अतिक्रमण को अपराध व कट्टरता से जोड़ते हुए प्रशासनिक कार्रवाई तेज़ की गई।

कानून का सख़्त पालन

अवैध निर्माणों पर कार्रवाई और न्यायालयी आदेशों के अनुपालन को सरकार ने अपनी प्राथमिकता बताया। संदेश साफ़ रहा—कानून से ऊपर कोई नहीं। यह रुख़ सुरक्षा के साथ-साथ शासन की विश्वसनीयता से भी जुड़ा बताया गया।

‘बुलडोज़र’ कार्रवाई और संदेश

सांप्रदायिक हिंसा या सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़े मामलों में अवैध ढांचों पर त्वरित कार्रवाई ने अपराधियों में भय पैदा करने का दावा किया गया। सरकार का कहना है कि अपराध का जवाब सख़्ती से दिया जाएगा।

राजनीतिक टकराव

भाजपा ने महाविकास आघाड़ी (एमवीए) पर ‘वोट बैंक’ की राजनीति के चलते सुरक्षा से समझौते का आरोप लगाया है। पार्टी का दावा है कि सख़्ती के बिना महानगर सुरक्षित नहीं रह सकता।

आज की मुंबई

आज त्योहार अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न होते हैं, पुलिस और एजेंसियां अधिक सतर्क दिखाई देती हैं। सरकार का कहना है कि मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और स्पष्ट नीति ने शहर को सुरक्षा का नया कवच दिया है।

निष्कर्ष:
मुंबई की सुरक्षा केवल चुनावी मुद्दा नहीं, बल्कि शहर के अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न है। भाजपा की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति समर्थकों के अनुसार भयमुक्त महानगर की ओर कदम है—अब फैसला मुंबईकरों के हाथ में है कि वे किसे सुरक्षा की बागडोर सौंपते हैं।

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